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"पॉलीवुड की अप्सरा' उत्तर-आधुनिक मनुष्य के मोहभंग की तथा-कथा है, जिसमें गिरीश पंकज विशुद्ध व्यंग्यकार सिद्ध होते है । (जहाँ हास्य का हाशिए पर भी जगह नहीं है) तात्पर्य यह है कि इस उपन्यास में व्यंग्यकार ने  यथार्थ का पल्ला कहीं भी नहीं छोडा है, जिससे यह समझने में आसानी होती है कि व्यंग्य-लेखन ही सच्चा लेखन हो सकता है। जिस प्रकार 'हॉलीवुड' के सादृश्य पर 'बॉलीबुड' रखा गया, उसी प्रकार 'बॉलीबुड' कै सादृश्य पर 'पॉलीवुड' बना । 'पॉलीवुड की अप्सरा' भी बॉलीवुड की समांतर भूमि में अपने रूप, रस, गंध और स्पर्श के साथ प्रतिष्ठित है  ।

The Tantra, its cults and tactics have constantly attracted interest around the world because of its strange disciplines and various concealed tricks.

देश-विदेश की विस्तृत यात्रा करने वाले भैरप्पा ने साहित्येतर चिंतनपरक कृतियों की भी रचना की है। आपकी साहित्यिक साधना से संबंधित कई आलोचनात्मक पुस्तकें भी प्रकाशित हो  चुकी  हैं।

पाठक को भीतर तक छू लेता है। हाल ही में गोवा विश्वविद्यालय में स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में ‘मन्नू भंडारी का रचनात्मक अवदान’ पर एक पूरा पेपर रखा गया है। पूरे एक दिन के सेमिनार में प्राध्यापकों के साथ-साथ छात्र-छात्राओं यानी उनके पाठकों ने भी जिस उत्साह और स्फूर्ति का परिचय दिया, वह आज भी मन्नू जी को हिंदी साहित्य के एक बहुत बड़े वर्ग का चहेता रचनाकार साबित करता है।

लेखिका के सभी उपन्यास-'टूटा हुआ इंद्रधनुष', 'लेडीज़ क्लब', 'अनारो', 'बेगाने घर में', 'खातुल', 'तिरछी बौछार’ तथा 'गंजी' के साथ-साथ उनके प्रकाशित कूल कहानी-संग्रहों में संकलित कहानियों को इस संकलन-द्वय से एक साथ प्रस्तुत किया गया है ।

चैसर ने कहानियों के कुछ पात्र वास्तविक जीवन से भी लिए हैं। इसी तरह तीर्थयात्रियों में कुछ वास्तविक जीवन के लोगों से मेल खाते थे। लंदन की जो सराय तीर्थयात्रियों के रुकने की जगह बनी, एक वास्तविक सराय से प्रेरित थी।

शरद जोशी के व्यंग्य कॉलम 'प्रतिदिन' पर लिखते हुए बहुत- सी बातें मेरे मन मैं हैं ।

दोनों की मुलाकात दोनों  के ही लिए एक अविस्मरणीय घटना बन गई । सुनंदा और सुमित विभिन्न विषयों पर बातचीत करने लगे, जैसे ईश्वर, धर्म, नैतिकता, प्रेम, विवाह, स्त्री, लोकतंत्र, मानव अधिकार आदि । इसके साथ ही, दोनों के हृदय अनुराग की आभा से भरते चले गए । लेकिन परिपाक की ऐश्वर्यमयी रात के तुरंत बाद जुदाई का मुहूर्त आ पहुंचा - दोनों की जिंदगी को एक नई दिशा प्रदान करने के लिए ।

शरद जोशी ने सात सालों तक रोज एक नया विषय उठाया, उसे एकदम नईं दृष्टि से देखा और फिर उसे एकदम नई भाषा-शैली के प्रयोग से ऐसा बनाया कि उन दिनो 'नवभारत टाइम्स' का वह कोना मानो फैलकर 'पूरे अखबार पर छा गया था । और अखबार पर ही क्यों, यह तो मानो पाठको की पूरी कायनात पर छा गया था । ऐसा व्यंग्य कॉलम न तो पहले लिखा गया था, न सोचा ही गया था । कुछ ही दिनो से वह इतना लोकप्रिय हो गया था कि यह अफवाह रहती थी कि एक जमाने में शरद जोशी का पेमेंट राजेन्द्र माथुर (जो अखबार के संपादक थे) से ज्यादा हो गया था । उसकी लोकप्रियता के चलते 'टाइम्स आँफ इंडिया' से उसके अंग्रेजी अनुवाद देने की कोशिश भी की गई । तब यह बात और भी विहित से सामने आई कि शरद जोशी जैसे जमीनी लेखक की मुहावरेदार और स्थानीय गमक से समृद्ध भाषा का अनुवाद करना लगभग असंभव बात है ।

वर्तमान website समय की शायद ही कोई भी समस्या हो, जिस पर कवि ने अपनी कलम न चलाई हो । चाहे गरीबी हो या बेकारी, भ्रष्टाचार हो या सांप्रदायिकता, हिंसा हो या अपराध, राजनीति की गिरावट हो या नौकरशाही की सुविधापरस्ती, समाज में टूटते- बिखरते रिश्तों एवं मानवीय मूल्यों के क्षरण पर कवि का ध्यान बार-बार जाता है और वह बार-बार अपनी रचनाओं में उन्हें पिरोता है ।

अपनी कोमल भावनाओं तथा विवेकशीलता और संवेदनशीलता के कलात्मक संयोजन के कारण अनामिका की कविताएं अलग से पहचानी जाती हैं । स्त्री-विमर्श के इस दौर में स्त्रियों के संघर्ष और शक्ति का चित्रण तो अपनी-अपनी तरह से हो रहा है, लेकिन महादेवी वर्मा ने जिस वेदना और करुणा को अपनी कविता के केंद्र में रखा था, उसका विस्तार केवल अनामिका ही कर पाती हैं । वह सहज ही स्त्री के दु:ख को वंचितजनों के दु:ख से जोड़ लेती हैं । लेकिन ऐसा करते हुए भी भारतीय समाज में पुरुष सत्ता और सामंती संरचना से जूझ रही स्त्रियों के दु:ख और संघर्ष का सरलीकरण या सामान्यीकरण नहीं करतीं ।

यही कारण है कि मनुष्य सोचता कुछ है, दिखता कुछ है और करता कुछ और है। समय आने पर प्रगाढ़ संबंधों को भी भूल जाता है। इस संसार में जन्म देने वाले ईश्वर की कृतज्ञता और श्रद्धा को भूल जाता है। ब्रह्मलोक में इसी बात पर चर्चा चल रही है कि क्या मनुष्य इस पृथ्वी लोक का सबसे सीधा जीव है?

दूसंरे तीन कालखंडों (रैन और चंदा) में लेखक ने जनमेजय से पृथ्वीराज चौहान तक के सामाजिक-राजनीतिक इतिवृत्त को जीवंत किया है । दूसरे शब्दों में, भारतीय मध्यकाल का कथात्मक इतिहास । उसका आरम्भ, उत्कर्ष और क्रमश: पतन । इस प्रक्रिया में वह सामंत वर्ग से जनता के रिश्ते को तो व्याख्यायित करता ही है, भारतीय और विदेशी जातियों के पारस्परिक सम्बन्धों को भी विश्लेषित करता है । महत्त्वपूर्ण यह कि ऐसा करते हुए रांगेय राघव इस समूचे इतिहास को हिंदू काल, राजपूत काल और मुस्लिम काल में बाँटकर नहीं देखत, बल्कि भारतीय संस्कृति में एकमेक मानवीय मूल्यों को उजागर करते हैं । धर्म के विभिन्न रूपों को उन्होंने उतना महत्व नहीं दिया, जितना राजनीतिक परिस्थितियों और सांस्कृतिक जीवन को । इस सन्दर्भ में उन्होंने कहा भी है कि “धर्म की व्याख्या मूलत: तत्कालीन सामाजिक और राजनीतिक परिस्थिति में है । अपने विवेचनों में मैनें आज के दृष्टिकोण से काम लिया है, किन्तु कथाओं में यही प्रयत्न किया है कि युगानुसार मनुष्यों का चिंतन दिखाऊँ ।" दरअसल मनुष्य को आँख-ओझल कर  इतिहास के खण्डहरों में भटकना उन्हें कतई स्वीकार नहीं ।

ज्ञानेन्द्रपति हिन्दी के एक विलक्षण कवि-व्यक्तित्व हैं, यह तथ्य अब निर्विवाद है । कवि-कर्म का ही जीवन-चर्या बनाने वाले ज्ञानेन्द्रपति की प्रतिष्ठा का आधार संस्थानों तथा महाजनों को सनदें और पुरस्कारों की संख्या नहीं बल्कि कविता-प्रेमियों की प्रीति है, जिसे उनकी कविता ने जीवन-संघर्ष के मोर्चों पर मौजूद रहकर और 'अभिव्यक्ति के ख़तरे' उठाकर अर्जित किया है । वे उन थोड़े-से कवियों में हैं, जिनके बल पर, कविता की तरफ से जनता का जी उचटने के बावजूद, समकालीन कविता के सार्थक स्वर की विश्वसनीयता बरकरार है ।

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